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जयंती विशेष: शिवाजी सांवत कैसे बने 'मृत्युंजयकार', क्यों कहा- 'ये पात्र मेरे मन मस्तिष्क का हिस्सा बन गया'

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New Delhi, 30 अगस्त . 2025 में एक फिल्म रिलीज हुई नाम था ‘छावा’. ‘जेन अल्फा’ इसका फैन हो गया. फिल्म की स्टार कास्ट तो शानदार थी ही लेकिन इसकी कहानी धांसू थी. मूल प्रेरणा इसी नाम से लिखा गया उपन्यास ‘छावा’ था. जिसे रचा था शिवाजी सावंत ने. अंग्रेजी में एक शब्द है ‘मास हिस्टिीरिया’, यानी लोगों को अपने कलम के जादू से दिवाना बना देना. इस कथाकार ने जो भी गढ़ा वो कुछ ऐसा ही था. मराठी में लिखा उपन्यास ‘मृत्युंजय’ इनकी बड़ी पहचान है. उपन्यास की समीक्षा बहुत होती है लेकिन शिवाजी सावंत के ‘मृत्युंजय’ का प्रिव्यू बहुत जरूरी है. जिससे एहसास हो कि रचना यूं ही नहीं गढ़ी जाती बल्कि इसके पीछे अथक प्रयास, सुलझे विचार और इतिहास की परख जरूरी होती है. कर्ण की पीड़ा को सधे शब्द मिलते हैं तो वो पाठकों की आत्मा को छू जाती है.

‘मृत्युंजय’ केवल एक उपन्यास नहीं बल्कि अनुभूति है. इसकी शैली आत्मकथात्मक होते हुए भी अत्यंत साहित्यिक और दार्शनिक है. लेखक ने पौराणिक चरित्र को इतना सजीव किया है कि पाठक केवल कर्ण को नहीं, खुद को भी पढ़ता है. अपनी जीवन यात्रा को अनफोल्ड होते देखता है. अपने संघर्षों और अपने सपनों को पलते हुए देखता है.

शिवाजी सावंत ने इस रचना के माध्यम से कर्ण को जो मान दिया, वह भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर है. ‘मृत्युंजय’ हर उस व्यक्ति की कहानी है जो नियति के खिलाफ लड़ता है – और अंततः अमर हो जाता है. आखिर इसे गढ़ने का ख्याल कैसे आया? मृत्युंजय की प्रस्तावना में इसका जिक्र है. शिवाजी सावंत ने उन विचारों को साझा किया है जिसने कर्ण की आत्मकथा का रूप लिया. वो कहते हैं- मैं माध्यमिक विद्यालय का छात्र था. हिंदी में मैंने केदारनाथ मिश्र की कविता ‘कर्ण’ इतनी बार दोहराई कि वह मेरे मन-मस्तिष्क का हिस्सा हो गई. कर्ण का दिव्य सुवर्ण और उसका आत्मबल मेरे भीतर गहराई से गूंजने लगा. ये भाव मेरे भीतर कुछ बिगाड़ गए — जैसे कि कर्ण की पीड़ा और उसका अस्तित्व मेरी रेशमी संवेदनाओं पर ज्यों‑का‑त्यों छा गया हो. ऐसा लगा कि यह व्यक्तित्व मुझे भीतर से खाये जा रहा है.

सावंत के लिए ये एक ट्रिगर था, फिर उन्होंने जो किया उसके लिए साहित्य जगत उनका ऋणी है. आगे लिखा, “और फिर एक दिन जब मैं नित्य स्नान और पूजा-संस्कार कर रहा था, मैंने मंत्रोच्चारण करते हुए— “ओम भूर्भुवः स्वः…” — मन में एक अकल्पनीय ऊष्मा अनुभव की. एकदम से कर्ण के शब्द गूंजने लगे: ‘आज मुझे अपनी कहानी सबको सुनानी है.’ उस क्षण से मैं लिखता ही चला गया. पहले प्रकरण में कर्ण बोले, उसके बाद शोण का आत्मनिवेदन — रचना की लय धीरे-धीरे आकार लेती चली गई.”

इस लिखाड़ ने अपनी कहानी को मूर्त रूप दिया. ठान लिया: कौरव‑पांडवों के इस पावन कुर्विक्रम भूमि—कुरुक्षेत्र की आत्मा को महसूस किए बिना यह कृति निहायत अधूरी है. तब मैंने छुट्टी ली, एक कैमरा लिया, और अकेले कोल्हापुर से निकल पड़ा कुरुक्षेत्र की ओर—उस भूमि पर चलने, देखने, महसूस करने, और फिर लिखने के लिए. यह मेरी यात्रा लेखन का आरंभ था.

एक बाल मन पर अच्छी कृति का क्या प्रभाव पड़ता है इसका साक्षात उदाहरण शिवाजी सावंत हैं. 7वीं-8वीं में पढ़ते हुए ही इन्हें केदारनाथ मिश्र के ‘कर्ण’ से सहानुभूति हुई और फिर इस प्रेम ने भारत का साक्षात्कार ‘मृत्युंजयकार’ से कराया. ऐसी कृति जो बरसों बाद भी पाठकों के मन को उद्वेलित करती है. जब कर्ण कहता है- “मैं सूतपुत्र हूं—यह मेरा अपराध नहीं, मेरा प्रारब्ध है.” तो ये एक वाक्य उसके समूचे जीवन का सार बन जाता है. ‘मृत्युंजय’ बार-बार इस प्रश्न को उठाता है, और कर्ण की पीड़ा पढ़ने वाले के हृदय को भीतर तक भेद जाती है.

मराठी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार शिवाजी सावंत ने कालजयी रचनाओं से साहित्य जगत को समृद्ध किया. उनका जन्म 31 अगस्त 1940 को हुआ था और पूरा नाम शिवाजी गोविंद राज सावंत था. 18 सितंबर 2002 को आखिरी सांस ली लेकिन अपने पात्रों को हमेशा के लिए अमर कर दिया.

केआर/

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